यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात है — 'गिरामस्म्येकमक्षरम्' — वाणियों में मैं एक अक्षर ओंकार हूँ। ओंकार वह ध्वनि है जो बिना होंठ हिलाए उत्पन्न होती है — 'ॐ'। यह ब्रह्म का नाद-रूप है। सब शब्दों में वह सबसे मूल है।
और यज्ञों में जप-यज्ञ। गीता यहाँ जप को सबसे बड़ा यज्ञ बताती है। बाहरी हवन-सामग्री नहीं चाहिए — केवल मन में नाम जपना, वही सबसे श्रेष्ठ यज्ञ है। हिमालय — जो हमेशा खड़ा है, अटल — वह भी परमात्मा की विभूति है।