📿 श्लोक संग्रह

पुरोधसां च मुख्यं माम्

गीता 10.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥
पुरोधसाम्
पुरोहितों में
च मुख्यम्
और मुख्य को
माम् विद्धि
मुझे जानो
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
बृहस्पतिम्
बृहस्पति
सेनानीनाम् अहम्
सेनानायकों में मैं
स्कन्दः
स्कंद — कार्तिकेय
सरसाम् अस्मि
जलाशयों में हूँ
सागरः
सागर — समुद्र

बृहस्पति देवताओं के गुरु और पुरोहित हैं — ज्ञान और विद्या के देवता। पुरोहितों में वे सबसे प्रमुख हैं। स्कंद — कार्तिकेय — देवताओं के सेनापति हैं। ज्ञान और शौर्य — दोनों परमात्मा के रूप हैं।

और जलों में समुद्र। समुद्र की विशालता, उसकी गहराई, उसका कभी न भरना — ये सब परमात्मा के गुणों की याद दिलाते हैं। जो सबसे बड़ा है, जो सब धाराओं को अपने में समेट लेता है — वह परमात्मा है।

यह श्लोक ज्ञान, शक्ति और विशालता — तीनों आयामों में विभूति बताता है। बृहस्पति ज्ञान का, स्कंद शक्ति का, सागर विशालता का प्रतीक है।

स्कंद का उल्लेख गीता में यहाँ एकमात्र बार आता है। उनकी कथा स्कंद पुराण में विस्तार से है — यहाँ उनका नाम विभूति-सूची में सम्मान के साथ आया है।

अध्याय 10 · 24 / 42
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