📿 श्लोक संग्रह

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि

गीता 10.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥
रुद्राणाम्
रुद्रों में
शङ्करः च अस्मि
शंकर हूँ
वित्तेशः
धन के ईश — कुबेर
यक्षरक्षसाम्
यक्षों और राक्षसों में
वसूनाम्
वसुओं में
पावकः च अस्मि
पावक — अग्नि हूँ
मेरुः
मेरु पर्वत
शिखरिणाम् अहम्
पर्वतों में मैं

ग्यारह रुद्रों में शंकर सबसे प्रमुख हैं। यहाँ कृष्ण कह रहे हैं — रुद्रों में मैं शंकर हूँ। यह बात बहुत सुंदर है — विष्णु-स्वरूप कृष्ण, शिव को अपनी विभूति बता रहे हैं। गीता में कोई देव छोटा नहीं — सब एक ही तत्व के रूप हैं।

मेरु पर्वत — यह पुराणों में सृष्टि का केंद्र माना जाता है। यक्षों में कुबेर, वसुओं में अग्नि — हर वर्ग में जो सबसे प्रमुख है, वही कृष्ण की विभूति है। यह दृष्टि मिल जाए तो हर श्रेष्ठ चीज में परमात्मा दिखने लगता है।

यह श्लोक देवताओं और प्रकृति दोनों में विभूति बताता है। शंकर का उल्लेख गीता की सांप्रदायिक तटस्थता का प्रमाण है — शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं को एक ही दृष्टि से देखा गया है।

भगवद्गीता में मेरु पर्वत का यह एकमात्र उल्लेख है। पुराणों में मेरु की विस्तृत कथाएँ हैं — यहाँ उसे विभूति बताकर उसकी महत्ता स्वीकार की गई है।

अध्याय 10 · 23 / 42
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