📿 श्लोक संग्रह

महर्षीणां भृगुरहम्

गीता 10.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
महर्षीणाम्
महर्षियों में
भृगुः अहम्
मैं भृगु हूँ
गिराम् अस्मि
वाणियों में हूँ
एकम् अक्षरम्
एक अक्षर — ओंकार
यज्ञानाम्
यज्ञों में
जपयज्ञः अस्मि
जप-यज्ञ हूँ
स्थावराणाम्
अचलों में — स्थिर चीजों में
हिमालयः
हिमालय

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात है — 'गिरामस्म्येकमक्षरम्' — वाणियों में मैं एक अक्षर ओंकार हूँ। ओंकार वह ध्वनि है जो बिना होंठ हिलाए उत्पन्न होती है — 'ॐ'। यह ब्रह्म का नाद-रूप है। सब शब्दों में वह सबसे मूल है।

और यज्ञों में जप-यज्ञ। गीता यहाँ जप को सबसे बड़ा यज्ञ बताती है। बाहरी हवन-सामग्री नहीं चाहिए — केवल मन में नाम जपना, वही सबसे श्रेष्ठ यज्ञ है। हिमालय — जो हमेशा खड़ा है, अटल — वह भी परमात्मा की विभूति है।

यह श्लोक ऋषि, शब्द, यज्ञ और पर्वत — चार वर्गों में विभूति बताता है। जप-यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ बताना गीता की भक्ति-परंपरा का महत्वपूर्ण संकेत है।

भगवद्गीता के तीसरे और चौथे अध्याय में यज्ञ के अनेक रूपों की बात है। 10.25 में जप-यज्ञ को उन सबमें सर्वोच्च कहा गया है — यह भक्तियोग की प्रधानता दर्शाता है।

अध्याय 10 · 25 / 42
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