📿 श्लोक संग्रह

हन्त ते कथयिष्यामि

गीता 10.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
हन्त
हाँ, अच्छा — ठीक है
ते
तुम्हें
कथयिष्यामि
बताऊँगा
दिव्याः
दिव्य
हि
निश्चय
आत्मविभूतयः
अपनी विभूतियाँ
प्राधान्यतः
प्रमुख रूप से
कुरुश्रेष्ठ
हे कुरुश्रेष्ठ — कुरुओं में श्रेष्ठ
न अस्ति
नहीं है
अन्तः
अंत
विस्तरस्य मे
मेरे विस्तार का

'हन्त' — यह एक बड़ा मीठा शब्द है। इसका अर्थ है — अच्छा, ठीक है, हाँ। जैसे एक दादा-दादी बच्चे की बात सुनकर प्रेम से कहें — अच्छा, सुनो तो। यहाँ कृष्ण यही भाव रखते हैं। अर्जुन ने तीन बार माँगा, कृष्ण ने 'हन्त' कहकर स्वीकार किया।

लेकिन कृष्ण एक बात पहले ही बता देते हैं — मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। जो बताऊँगा, वह प्रमुख उदाहरण हैं — पूरी सूची नहीं। यह ईमानदारी है। 10.42 में भी यही बात दोहराई जाएगी।

यह वह श्लोक है जहाँ विभूतियोग की विभूति-सूची औपचारिक रूप से शुरू होती है। 10.1-18 भूमिका थी; 10.19 द्वार खोलता है और 10.20-42 तक विभूतियाँ चलती हैं।

भगवद्गीता में 'प्राधान्यतः' शब्द संकेत देता है — यह चुने हुए उदाहरण हैं। परमात्मा की विभूतियाँ अनंत हैं, गिनी नहीं जा सकतीं।

अध्याय 10 · 19 / 42
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