यह श्लोक सुनने वाले का सबसे सुंदर प्रशंसापत्र है। अर्जुन कह रहा है — आपके वचन अमृत की तरह हैं, सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती। इससे बड़ी प्रशंसा किसी वक्ता के लिए क्या हो सकती है? जब श्रोता और बोलने वाले के बीच यह संबंध बनता है, तभी ज्ञान उतरता है।
'अमृतम्' — अमृत। गीता में ज्ञान को बार-बार अमृत कहा गया है। जैसे अमृत पीने से प्यास नहीं बुझती लेकिन मृत्यु-भय जाता है — ऐसे ही गीता के वचन बार-बार सुनने पर ताजे लगते हैं और संसार का भय कम होता है।