📿 श्लोक संग्रह

वक्तुमर्हस्यशेषेण

गीता 10.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
वक्तुम् अर्हसि
बताने के योग्य हैं — बताइए
अशेषेण
पूरी तरह — बिना शेष के
दिव्याः
दिव्य
हि
निश्चय ही
आत्मविभूतयः
आपकी विभूतियाँ
याभिः विभूतिभिः
जिन विभूतियों से
लोकान् इमान्
इन लोकों को
त्वम्
आप
व्याप्य
व्याप्त होकर
तिष्ठसि
रहते हैं

अर्जुन अब सीधे माँग रहा है — पूरी-पूरी बताइए, कुछ शेष मत छोड़िए। वह जानना चाहता है कि किन विभूतियों के द्वारा कृष्ण इन सब लोकों में व्याप्त हैं। यह प्रश्न ही अगले अठारह श्लोकों की विभूति-सूची का आधार है।

'व्याप्य तिष्ठसि' — व्याप्त होकर रहते हैं। यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। कृष्ण केवल स्वर्ग में नहीं हैं — वे पर्वत में, नदी में, सूर्य में, मन में — सब जगह व्याप्त हैं। यही विभूतियोग का मूल दर्शन है।

यह 10.16-18 का पहला श्लोक है — तीन श्लोकों में अर्जुन तीन बार विभूतियाँ जानने की माँग करता है। यह उसकी तीव्र जिज्ञासा का प्रमाण है।

भगवद्गीता में यह प्रश्न-पद्धति महत्वपूर्ण है। शिष्य का प्रश्न ही गुरु के उत्तर का द्वार खोलता है। 10.16 वह द्वार है जो 10.20-42 की विभूति-सूची खोलता है।

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