📿 श्लोक संग्रह

स्वयमेवात्मनात्मानम्

गीता 10.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
स्वयम् एव
स्वयं ही
आत्मना
अपने से
आत्मानम्
अपने को
वेत्थ
जानते हैं
त्वम्
आप
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम — श्रेष्ठ पुरुष
भूतभावन
भूतों को उत्पन्न करने वाले
भूतेश
भूतों के ईश्वर
देवदेव
देवों के देव
जगत्पते
जगत के स्वामी

यहाँ अर्जुन एक गहरी बात कह रहा है — आप खुद को खुद से जानते हैं। किसी और को पूछने की जरूरत नहीं। यह परमात्मा का स्वयंज्ञान है। जैसे दीपक को अपना प्रकाश दिखाने के लिए किसी और प्रकाश की जरूरत नहीं — परमात्मा को जानने के लिए किसी बाहरी प्रमाण की जरूरत नहीं।

फिर चार संबोधन — भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पति। ये चारों कृष्ण की व्यापकता दिखाते हैं। वे भूतों के जन्मदाता भी हैं, उनके स्वामी भी, देवों के भी देव, और पूरे जगत के पालक भी।

यह श्लोक 10.14 के बाद अर्जुन की स्तुति का समापन है। 10.12 से 10.15 तक अर्जुन बोल रहा है। अब 10.16 से वह प्रश्न करेगा — विभूतियाँ विस्तार से बताइए।

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में 'पुरुषोत्तम' का विस्तार से वर्णन है। 10.15 में वही सम्बोधन अर्जुन के मुख से आया है।

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