📿 श्लोक संग्रह

सर्वमेतदृतं मन्ये

गीता 10.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥
सर्वम् एतत्
यह सब
ऋतम्
सत्य — सच
मन्ये
मानता हूँ
यत्
जो
माम् वदसि
मुझे कहते हैं
केशव
हे केशव (कृष्ण)
न हि
नहीं
ते व्यक्तिम्
आपके रूप को
विदुः
जानते हैं
देवाः न दानवाः
न देव, न दानव

अर्जुन का यह वचन बहुत महत्वपूर्ण है। वह कह रहा है — हे केशव, आप जो कुछ कह रहे हैं, मैं उसे पूरी तरह सच मानता हूँ। यह श्रद्धा है। तर्क नहीं, प्रमाण नहीं — अर्जुन को कृष्ण के प्रति पूर्ण विश्वास है।

फिर वह जोड़ता है — न देव, न दानव — कोई आपके स्वरूप को नहीं जान सकते। यह 10.2 की बात को अर्जुन अपने शब्दों में दोहरा रहा है। अब तक सुना था, अब आत्मसात किया।

यह श्लोक अर्जुन के उत्तर का तीसरा भाग है (10.12, 10.13, 10.14)। स्तुति से शुरू हुआ, प्रमाण दिए, और अब श्रद्धा व्यक्त की। अब अगले श्लोकों में अर्जुन प्रश्न पूछेगा।

भगवद्गीता में श्रद्धा और ज्ञान का संतुलन महत्वपूर्ण है। 10.14 वह श्लोक है जहाँ दोनों एक जगह मिलते हैं।

अध्याय 10 · 14 / 42
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