📿 श्लोक संग्रह

तेषामेवानुकम्पार्थम्

गीता 10.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
तेषाम् एव
उन्हीं के लिए
अनुकम्पार्थम्
करुणा के लिए
अहम्
मैं
अज्ञानजम्
अज्ञान से उत्पन्न
तमः
अंधकार
नाशयामि
नष्ट करता हूँ
आत्मभावस्थः
आत्मा के भाव में स्थित — हृदय में बैठकर
ज्ञानदीपेन
ज्ञान के दीपक से
भास्वता
प्रकाशमान — चमकते हुए

यह श्लोक एक अत्यंत सुंदर उपमा देता है। कृष्ण कहते हैं — मैं उनके हृदय में बैठकर, ज्ञान के चमकते दीपक से, अज्ञान के अंधेरे को मिटाता हूँ। जैसे एक अँधेरे कमरे में एक दीपक जलाते हैं — अंधेरा तुरंत जाता है, दीपक को लड़ना नहीं पड़ता।

'आत्मभावस्थः' — आत्मा के भाव में स्थित। भगवान हर प्राणी के हृदय में पहले से हैं। जब भक्त की भक्ति पक जाती है, तो वही अंतरात्मा प्रकाश देने लगती है। यह बाहर से नहीं आता — भीतर से जागता है।

यह श्लोक 10.10 का स्वाभाविक विस्तार है। पहले कृष्ण ने बुद्धियोग देने की बात कही, अब बताया — वह बुद्धियोग कैसे काम करता है। हृदय में बैठकर ज्ञान का दीपक जलाकर।

भगवद्गीता के 13वें अध्याय में क्षेत्रज्ञ की बात है — वह आत्मा जो सब जानती है। 10.11 में वही क्षेत्रज्ञ करुणा से प्रकाश देती है।

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