यह और अगला श्लोक (10.13) मिलकर अर्जुन की स्तुति हैं। कृष्ण ने इतना बताया, तो अर्जुन के मन में जो समझ जागी, वह बाहर आई। वे एक-एक विशेषण कह रहे हैं — परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र, शाश्वत, दिव्य, आदि देव, अजन्मा, सर्वव्यापी।
यह केवल स्तुति नहीं है — यह अर्जुन की समझ का प्रमाण है। जो शिष्य सुनकर अपने शब्दों में गुरु को दोहरा सके, उसने सच में समझा। यहाँ अर्जुन वही कर रहा है।