📿 श्लोक संग्रह

परं ब्रह्म परं धाम

गीता 10.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
परम् ब्रह्म
परम ब्रह्म
परम् धाम
परम धाम — परम निवास
पवित्रम् परमम्
परम पवित्र
भवान्
आप
पुरुषम्
पुरुष — चेतन तत्व
शाश्वतम्
शाश्वत — सदा रहने वाला
दिव्यम्
दिव्य
आदिदेवम्
आदि देव — पहला देव
अजम्
अजन्मा
विभुम्
सर्वव्यापी

यह और अगला श्लोक (10.13) मिलकर अर्जुन की स्तुति हैं। कृष्ण ने इतना बताया, तो अर्जुन के मन में जो समझ जागी, वह बाहर आई। वे एक-एक विशेषण कह रहे हैं — परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र, शाश्वत, दिव्य, आदि देव, अजन्मा, सर्वव्यापी।

यह केवल स्तुति नहीं है — यह अर्जुन की समझ का प्रमाण है। जो शिष्य सुनकर अपने शब्दों में गुरु को दोहरा सके, उसने सच में समझा। यहाँ अर्जुन वही कर रहा है।

यह 10.12-13 का पहला भाग है। अर्जुन अब बोल रहा है। 10.1 से 10.11 तक कृष्ण ने बताया; 10.12-13 में अर्जुन की प्रतिक्रिया है। फिर 10.14 से अर्जुन और प्रश्न पूछेगा।

भगवद्गीता में यह संवाद-शैली महत्वपूर्ण है। केवल उपदेश नहीं — प्रश्न, उत्तर, स्तुति, फिर प्रश्न। यह जीवंत संवाद है।

अध्याय 10 · 12 / 42
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