अब दुर्योधन अपने पक्ष के महान योद्धाओं के नाम गिनाता है। सबसे पहले वह स्वयं द्रोणाचार्य को रखता है, फिर भीष्म पितामह, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और भूरिश्रवा — ये सब कौरव सेना के स्तम्भ थे।
भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान था — वे जब तक चाहें जीवित रह सकते थे। कर्ण सूर्यपुत्र थे और अर्जुन के समान धनुर्धर। कृपाचार्य चिरंजीवी माने जाते हैं। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र और अत्यन्त शक्तिशाली योद्धा थे।
दुर्योधन चतुराई से सबसे पहले द्रोणाचार्य का नाम लेता है — "भवान्" अर्थात "आप"। इससे गुरु को सम्मान भी मिलता है और यह संदेश भी जाता है कि "आप हमारे सबसे बड़े बल हैं।" यह एक राजनेता की भाषा है जो अपने सेनापतियों का मनोबल बढ़ाना चाहता है।