📿 श्लोक संग्रह

अन्ये च बहवः शूराः

गीता 1.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
अन्ये
और भी
बहवः
बहुत से
शूराः
शूरवीर
मदर्थे
मेरे लिए
त्यक्तजीविताः
प्राण त्यागने को तैयार
नानाशस्त्रप्रहरणाः
अनेक शस्त्रों से सुसज्जित
सर्वे
सभी
युद्धविशारदाः
युद्धकला में निपुण

दुर्योधन कौरव-पक्ष के प्रमुख नाम गिनाने के बाद कहता है कि इनके अलावा भी बहुत-से शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार हैं। ये सभी तरह-तरह के शस्त्रों से सज्जित हैं और युद्धकला में अत्यन्त निपुण हैं।

"मदर्थे त्यक्तजीविताः" — मेरे लिए जान देने को तैयार — दुर्योधन के ये शब्द उसके अहंकार को दर्शाते हैं। वह मानता है कि ये सब उसके लिए लड़ रहे हैं। वास्तव में अधिकतर योद्धा अपने कर्तव्य, प्रतिज्ञा या राज्य-धर्म के कारण कौरव पक्ष में थे — दुर्योधन के प्रति व्यक्तिगत भक्ति से नहीं।

यह श्लोक बताता है कि कौरव सेना संख्या और शस्त्र-बल में कितनी विशाल थी। लेकिन जैसा कि आगे चलकर गीता सिखाती है — केवल सेना की संख्या से युद्ध नहीं जीते जाते, धर्म के साथ होना सबसे बड़ा बल है।

इस श्लोक से दुर्योधन की कौरव-पक्ष की योद्धा-सूची पूरी होती है। अगले श्लोक (1.10) में वह दोनों सेनाओं की शक्ति की तुलना करेगा।

"युद्धविशारदाः" — युद्ध में कुशल — यह शब्द बताता है कि कौरव सेना में अनुभवी और प्रशिक्षित योद्धा थे। फिर भी अन्ततः धर्म की विजय हुई — यही महाभारत का सन्देश है।

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