दुर्योधन कौरव-पक्ष के प्रमुख नाम गिनाने के बाद कहता है कि इनके अलावा भी बहुत-से शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार हैं। ये सभी तरह-तरह के शस्त्रों से सज्जित हैं और युद्धकला में अत्यन्त निपुण हैं।
"मदर्थे त्यक्तजीविताः" — मेरे लिए जान देने को तैयार — दुर्योधन के ये शब्द उसके अहंकार को दर्शाते हैं। वह मानता है कि ये सब उसके लिए लड़ रहे हैं। वास्तव में अधिकतर योद्धा अपने कर्तव्य, प्रतिज्ञा या राज्य-धर्म के कारण कौरव पक्ष में थे — दुर्योधन के प्रति व्यक्तिगत भक्ति से नहीं।
यह श्लोक बताता है कि कौरव सेना संख्या और शस्त्र-बल में कितनी विशाल थी। लेकिन जैसा कि आगे चलकर गीता सिखाती है — केवल सेना की संख्या से युद्ध नहीं जीते जाते, धर्म के साथ होना सबसे बड़ा बल है।