📿 श्लोक संग्रह

अपर्याप्तं तदस्माकम्

गीता 1.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥
अपर्याप्तम्
असीमित (अथवा अपर्याप्त)
तत्
वह
अस्माकम्
हमारा
बलम्
बल (सेना)
भीष्माभिरक्षितम्
भीष्म द्वारा रक्षित
पर्याप्तम्
सीमित (अथवा पर्याप्त)
तु
परन्तु
इदम्
यह
एतेषाम्
इनका (पाण्डवों का)
भीमाभिरक्षितम्
भीम द्वारा रक्षित

यह श्लोक बड़ा रोचक है क्योंकि "अपर्याप्त" और "पर्याप्त" शब्दों के दो अर्थ निकलते हैं। एक अर्थ के अनुसार दुर्योधन कहता है — "भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना असीमित (अपार) है, जबकि भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना सीमित है।" यह उसका आत्मविश्वास दिखाता है।

लेकिन दूसरा अर्थ उलटा है — "हमारी सेना अपर्याप्त (कम) है, जबकि उनकी सेना पर्याप्त (काफ़ी) है।" यह दुर्योधन के भीतर छिपे भय को प्रकट करता है। अनेक विद्वान मानते हैं कि दुर्योधन अनजाने में अपना डर प्रकट कर बैठा।

भीष्म और भीम — दोनों नाम एक जैसे लगते हैं लेकिन दोनों अलग-अलग पक्षों में हैं। भीष्म कौरव सेना के सेनापति हैं, भीम पाण्डव पक्ष के सबसे बलशाली योद्धा। दुर्योधन दोनों की तुलना करके अपनी सेना को बड़ा दिखाने का प्रयास करता है।

यह श्लोक दुर्योधन के भाषण का अन्तिम भाग है। इसके बाद भीष्म पितामह शंख बजाकर युद्ध का शंखनाद करते हैं। "अपर्याप्त" शब्द की द्विअर्थता पर विद्वानों में चर्चा होती रही है।

कौरव सेना में 11 अक्षौहिणी सैनिक थे जबकि पाण्डव पक्ष में 7 अक्षौहिणी। संख्या की दृष्टि से कौरव बड़े थे, लेकिन अन्ततः धर्म-पक्ष ही विजयी हुआ।

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