📿 श्लोक संग्रह

अस्माकं तु विशिष्टा ये

गीता 1.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥
अस्माकम्
हमारे (पक्ष में)
तु
परन्तु
विशिष्टाः
विशेष (प्रमुख)
ये
जो
तान्
उन्हें
निबोध
जान लीजिए
द्विजोत्तम
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ
नायकाः
नायक (सेनापति)
मम
मेरी
सैन्यस्य
सेना के
संज्ञार्थम्
जानकारी के लिए

पाण्डव-पक्ष के योद्धाओं को गिनाने के बाद अब दुर्योधन अपने पक्ष के प्रमुख योद्धाओं का नाम बताने लगता है। वह कहता है — "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ (द्रोणाचार्य), अब मैं आपको अपनी सेना के प्रमुख नायकों के नाम बताता हूँ, ताकि आप उन्हें जान लें।"

दुर्योधन द्रोणाचार्य को "द्विजोत्तम" कहकर सम्बोधित करता है — अर्थात ब्राह्मणों में श्रेष्ठ। यह सम्मानसूचक शब्द है, लेकिन इसमें एक सूक्ष्म संकेत भी है — दुर्योधन द्रोणाचार्य की ब्राह्मण पहचान को याद दिला रहा है ताकि वे अपनी पूरी विद्या का प्रयोग युद्ध में करें।

"संज्ञार्थम्" — जानकारी के लिए — यह शब्द दर्शाता है कि दुर्योधन यह सूची गुरु को प्रेरित और आश्वस्त करने के लिए बता रहा है, ताकि द्रोणाचार्य को पता चले कि कौरव पक्ष में भी कमी नहीं है।

यह श्लोक एक संक्रमण-बिन्दु है — पाण्डव-पक्ष की सूची पूरी हो गई है और अब कौरव-पक्ष के योद्धाओं के नाम आएँगे। दुर्योधन अपनी सेना की शक्ति का प्रदर्शन करने वाला है।

ध्यान दें कि दुर्योधन कहता है "मम सैन्यस्य" — मेरी सेना। वह स्वयं को सेना का स्वामी मानता है, जबकि सेनापति भीष्म पितामह हैं। यह उसके अहंकार की एक और झलक है।

अध्याय 1 · 7 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 7 / 47 अगला →