📿 श्लोक संग्रह

धृष्टकेतुश्चेकितानः

गीता 1.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥
धृष्टकेतुः
धृष्टकेतु (चेदि नरेश)
चेकितानः
चेकितान (यादव वीर)
काशिराजः
काशी के राजा
वीर्यवान्
पराक्रमी
पुरुजित्
पुरुजित (कुन्ती के भाई)
कुन्तिभोजः
कुन्तिभोज (कुन्ती के पिता)
शैब्यः
शैब्य (शिबि देश का राजा)
नरपुङ्गवः
नरश्रेष्ठ

दुर्योधन पाण्डव सेना के और योद्धाओं के नाम गिनाता जाता है। धृष्टकेतु चेदि देश के राजा थे, चेकितान यादव कुल के प्रसिद्ध वीर थे, और काशी के राजा अपने पराक्रम के लिए जाने जाते थे। ये सब पाण्डवों के पक्ष में खड़े थे।

पुरुजित और कुन्तिभोज कुन्ती माता के परिवार से थे — अर्थात पाण्डवों के मामा-पक्ष के योद्धा। शैब्य शिबि देश के नरश्रेष्ठ राजा थे। इन सबका नाम लेकर दुर्योधन यह जताना चाहता है कि पाण्डवों ने चारों दिशाओं से सहायता जुटाई है।

जब कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी की ताकत बार-बार गिनाए, तो समझ लो कि भीतर से वह डरा हुआ है। दुर्योधन की यह लम्बी सूची उसके आत्मविश्वास की कमी को दर्शाती है।

यह श्लोक पाण्डव-पक्ष के मित्र राजाओं की सूची का दूसरा भाग है। महाभारत में इन राजाओं की अपनी-अपनी कथाएँ हैं — प्रत्येक ने किसी न किसी कारण से पाण्डवों का साथ देने का निर्णय लिया था।

कुन्तिभोज का उल्लेख विशेष है क्योंकि वे कुन्ती के दत्तक पिता थे। परिवार के बंधन युद्ध में भी अपनी भूमिका निभाते हैं — यह बात इस श्लोक से स्पष्ट होती है।

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