दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है — "हे आचार्य, पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य धृष्टद्युम्न ने व्यूह-रचना में सजाया है।" दुर्योधन के इन शब्दों में एक चतुर चाल छिपी है।
धृष्टद्युम्न राजा द्रुपद का पुत्र था और द्रोणाचार्य का शिष्य भी। द्रुपद और द्रोण में पुरानी शत्रुता थी। दुर्योधन यह कहकर द्रोणाचार्य को याद दिला रहा है कि उनका अपना शिष्य अब उनके विरुद्ध खड़ा है — ताकि गुरु के मन में क्रोध जागे और वे पूरी शक्ति से युद्ध करें।
यह राजनीतिक चतुराई का उदाहरण है। दुर्योधन जानता था कि युद्ध केवल तलवार से नहीं, बल्कि मन के उत्साह से भी जीता जाता है।