📿 श्लोक संग्रह

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्

गीता 1.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
दृष्ट्वा
देखकर
तु
तब
पाण्डवानीकम्
पाण्डवों की सेना को
व्यूढम्
व्यूह-रचना में सजी हुई
दुर्योधनः
दुर्योधन ने
तदा
उस समय
आचार्यम्
आचार्य (द्रोणाचार्य) के पास
उपसङ्गम्य
पास जाकर
राजा
राजा (दुर्योधन)
वचनम्
वचन (बात)
अब्रवीत्
बोला

यहाँ से सञ्जय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का दृश्य सुनाना शुरू करते हैं। पाण्डवों की सेना को व्यूह-रचना में सजा देखकर दुर्योधन के मन में चिन्ता उत्पन्न हुई। पाण्डवों की सेना इतनी सुव्यवस्थित थी कि दुर्योधन को अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर बात करनी पड़ी।

ध्यान दीजिए — दुर्योधन सबसे पहले भीष्म पितामह के पास नहीं गया, बल्कि द्रोणाचार्य के पास गया। इसके पीछे एक कारण था — द्रोणाचार्य पाण्डवों के भी गुरु थे। दुर्योधन शायद उन्हें यह याद दिलाना चाहता था कि सामने खड़ी सेना में उनके अपने शिष्य भी हैं।

यह श्लोक हमें बताता है कि दुर्योधन भीतर से असुरक्षित था। जो व्यक्ति अपनी शक्ति में विश्वास रखता है, उसे दूसरों को उकसाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

यह श्लोक प्रथम अध्याय के दूसरे ही श्लोक में दुर्योधन के चरित्र की झलक देता है। कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं और युद्ध आरम्भ होने वाला है। सञ्जय का वर्णन यहाँ से कौरव पक्ष के दृष्टिकोण से चलता है।

आगे के कई श्लोकों में दुर्योधन द्रोणाचार्य को दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धाओं के नाम गिनाता है — यह उसकी घबराहट और राजनीतिक चतुराई दोनों को दर्शाता है।

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