📿 श्लोक संग्रह

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये

गीता 1.47 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
सञ्जय उवाच — एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
सञ्जय उवाच
सञ्जय ने कहा
एवम्
इस प्रकार
उक्त्वा
कहकर
अर्जुनः
अर्जुन ने
सङ्ख्ये
युद्धभूमि में
रथोपस्थे
रथ की पिछली बैठक पर
उपाविशत्
बैठ गए
विसृज्य
छोड़कर / त्यागकर
सशरम्
बाणों सहित
चापम्
धनुष को
शोकसंविग्नमानसः
शोक से व्याकुल मन वाले

सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं — इस प्रकार कहकर अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने बाणों सहित धनुष को छोड़ दिया और शोक से व्याकुल मन लिए रथ की पिछली बैठक पर बैठ गए।

यह दृश्य बहुत मार्मिक है। कल्पना कीजिए — कुरुक्षेत्र की विशाल रणभूमि, दोनों ओर लाखों सैनिक, शंख और नगाड़े गूँज रहे हैं — और बीच में महान धनुर्धर अर्जुन अपना गाण्डीव धनुष नीचे रखकर रथ में बैठ जाते हैं, आँखों में आँसू और मन में गहरा दुख।

'शोकसंविग्नमानसः' — शोक से विह्वल मन — यह एक शब्द पूरे प्रथम अध्याय का सार है। अर्जुन का विषाद यहाँ अपने चरम पर पहुँच गया है। यहीं से दूसरे अध्याय में कृष्ण के उपदेश का मार्ग खुलता है।

यह प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' का अन्तिम श्लोक है। ध्यान दीजिए कि इस अध्याय को भी 'योग' कहा गया है — क्योंकि अर्जुन का यह विषाद ही आगे चलकर गीता के सम्पूर्ण ज्ञान का द्वार बना। यदि अर्जुन दुखी न होते, तो कृष्ण कभी गीता नहीं सुनाते।

परम्परा में कहा जाता है कि कभी-कभी सबसे गहरा दुख ही सबसे बड़े ज्ञान का प्रवेशद्वार होता है। अर्जुन के शस्त्र रखने से गीता का उपदेश आरम्भ हुआ — यही इस श्लोक का शाश्वत महत्व है।

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