अर्जुन कहते हैं — कुल का नाश करने वालों के इन दोषों से, जो वर्णसंकर उत्पन्न करते हैं, सदा से चले आ रहे जाति-धर्म और कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो जब परिवार टूटता है, तो वो सब नियम और परम्पराएँ जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थीं — जैसे त्योहार मनाने का तरीका, बड़ों का सम्मान, पूजा-विधि — सब खत्म हो जाते हैं। जैसे किसी पुराने पेड़ की जड़ कट जाए तो डालियाँ अपने आप सूख जाती हैं।
अर्जुन यहाँ 'शाश्वत' शब्द का प्रयोग करते हैं — जो सदा से थे और सदा रहने चाहिए थे, वे भी नष्ट हो जाएँगे। यह उनकी चिन्ता की गहराई दिखाता है।