📿 श्लोक संग्रह

दोषैरेतैः कुलघ्नानाम्

गीता 1.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥
दोषैः
दोषों से
एतैः
इन
कुलघ्नानाम्
कुल का नाश करने वालों के
वर्णसङ्करकारकैः
वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले
उत्साद्यन्ते
नष्ट हो जाते हैं
जातिधर्माः
जाति के धर्म
कुलधर्माः
कुल के धर्म
और
शाश्वताः
शाश्वत / सदा से चले आने वाले

अर्जुन कहते हैं — कुल का नाश करने वालों के इन दोषों से, जो वर्णसंकर उत्पन्न करते हैं, सदा से चले आ रहे जाति-धर्म और कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो जब परिवार टूटता है, तो वो सब नियम और परम्पराएँ जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थीं — जैसे त्योहार मनाने का तरीका, बड़ों का सम्मान, पूजा-विधि — सब खत्म हो जाते हैं। जैसे किसी पुराने पेड़ की जड़ कट जाए तो डालियाँ अपने आप सूख जाती हैं।

अर्जुन यहाँ 'शाश्वत' शब्द का प्रयोग करते हैं — जो सदा से थे और सदा रहने चाहिए थे, वे भी नष्ट हो जाएँगे। यह उनकी चिन्ता की गहराई दिखाता है।

यह श्लोक अर्जुन की तर्क-शृंखला का सारांश-सा है। श्लोक 1.40 से 1.43 तक अर्जुन ने एक पूरी शृंखला रखी है — कुल का नाश → धर्म का नाश → स्त्रियों का पतन → वर्णसंकर → पितरों का पतन → जाति-धर्म और कुल-धर्म का नाश।

अध्याय 1 · 43 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 43 / 47 अगला →