📿 श्लोक संग्रह

कुलक्षये प्रणश्यन्ति

गीता 1.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥
कुलक्षये
कुल के नाश होने पर
प्रणश्यन्ति
नष्ट हो जाते हैं
कुलधर्माः
कुल की परम्पराएँ
सनातनाः
सनातन / पुरानी
धर्मे
धर्म के
नष्टे
नष्ट होने पर
कुलम्
पूरे कुल को
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
अधर्मः
अधर्म
अभिभवति
दबा लेता है
उत
निश्चय ही

अर्जुन कहते हैं कि जब कुल का नाश होता है, तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही सनातन परम्पराएँ नष्ट हो जाती हैं। और जब धर्म नष्ट होता है, तो सम्पूर्ण कुल पर अधर्म छा जाता है।

यह ऐसे ही है जैसे किसी गाँव में बड़े-बुज़ुर्ग चले जाएँ तो उनके साथ वे पुरानी बातें, रीति-रिवाज़ और संस्कार भी खो जाते हैं जो पीढ़ियों से चले आ रहे थे। फिर नई पीढ़ी को न सही-गलत का भेद पता रहता है, न परम्परा का ज्ञान।

अर्जुन यहाँ एक कड़ी जोड़ रहे हैं — युद्ध से कुल का नाश, कुल के नाश से धर्म का नाश, और धर्म के नाश से अधर्म का प्रसार। यह एक शृंखला है जो अंत में सबके लिए हानिकारक है।

यह श्लोक अर्जुन के विषाद में एक नई दिशा जोड़ता है — अब वे व्यक्तिगत दुख से आगे बढ़कर सामाजिक परिणामों की बात करने लगे हैं। कुलधर्म, सनातन परम्परा, और समाज की व्यवस्था — ये सब युद्ध से नष्ट होंगे।

परम्परा में 'कुलधर्म' का अर्थ उन नियमों और संस्कारों से है जो परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं — जैसे पूजा-पद्धति, अतिथि-सत्कार, और बड़ों का सम्मान।

अध्याय 1 · 40 / 47
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