📿 श्लोक संग्रह

कथं न ज्ञेयमस्माभिः

गीता 1.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
कथम्
कैसे
नहीं
ज्ञेयम्
जानना चाहिए
अस्माभिः
हमें
पापात्
पाप से
अस्मात्
इस
निवर्तितुम्
लौटने के लिए
कुलक्षयकृतम्
कुल के नाश से उत्पन्न
दोषम्
दोष को
प्रपश्यद्भिः
स्पष्ट देखने वाले
जनार्दन
हे कृष्ण

अर्जुन कहते हैं — हे जनार्दन, जब हम कुल के नाश से होने वाले दोष को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं, तो हमें इस पाप से लौटना क्यों नहीं चाहिए?

यह पिछले श्लोक (1.38) का दूसरा भाग है। अर्जुन का तर्क है — कौरव लोभ के अंधे हैं, उन्हें दोष नहीं दिखता। लेकिन हम तो देख रहे हैं कि कुल का नाश होगा, मित्रों से द्रोह होगा। जब हमें यह सब दिखता है, तो हमें इस पाप से दूर होना ही चाहिए।

जैसे कोई व्यक्ति सड़क पर गड्ढा देख ले, तो उसे उस रास्ते से बचना चाहिए — भले ही दूसरे अंधेरे में गिर जाएँ। अर्जुन कह रहे हैं कि जानते हुए भी पाप करना और भी बड़ा अपराध होगा।

श्लोक 1.38 और 1.39 मिलकर एक पूर्ण विचार बनाते हैं। अर्जुन यहाँ अपनी स्थिति को कौरवों से ऊँची बताते हैं — वे कहते हैं कि हमारी बुद्धि लोभ से अंधी नहीं है, इसलिए हम पर अधिक जिम्मेदारी है।

अध्याय 1 · 39 / 47
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