📿 श्लोक संग्रह

अधर्माभिभवात्कृष्ण

गीता 1.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥
अधर्माभिभवात्
अधर्म के बढ़ने से
कृष्ण
हे कृष्ण
प्रदुष्यन्ति
भ्रष्ट हो जाती हैं
कुलस्त्रियः
कुल की स्त्रियाँ
स्त्रीषु
स्त्रियों के
दुष्टासु
भ्रष्ट होने पर
वार्ष्णेय
हे वृष्णिवंशी
जायते
उत्पन्न होता है
वर्णसङ्करः
वर्णों का मिश्रण

अर्जुन कहते हैं — हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं, और जब स्त्रियाँ पथभ्रष्ट होती हैं तो वर्णसंकर उत्पन्न होता है — अर्थात कुल की परम्पराएँ टूट जाती हैं।

अर्जुन के समय में परिवार की व्यवस्था और परम्पराओं की रक्षा का बहुत महत्व था। जब युद्ध में पुरुष मारे जाते हैं, तो परिवार बिखर जाते हैं और सामाजिक ढाँचा कमज़ोर पड़ जाता है। अर्जुन यही चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं।

सरल शब्दों में कहें तो अर्जुन कह रहे हैं कि युद्ध से केवल रणभूमि पर नहीं, घरों में भी तबाही आती है। जब रक्षक ही न रहें तो घर-परिवार की व्यवस्था कैसे बनी रहेगी?

यह श्लोक अर्जुन की चिन्ता की शृंखला को आगे बढ़ाता है — कुल का नाश → धर्म का नाश → स्त्रियों का पतन → वर्णसंकर। प्रत्येक कड़ी पिछली से जुड़ी है।

यहाँ अर्जुन का दृष्टिकोण उनके समय की सामाजिक मान्यताओं पर आधारित है। गीता इन विचारों को अर्जुन के विषाद के रूप में प्रस्तुत करती है, जिन्हें कृष्ण आगे चलकर उत्तर देंगे।

अध्याय 1 · 41 / 47
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