📿 श्लोक संग्रह

यद्यप्येते न पश्यन्ति

गीता 1.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥
यद्यपि
यद्यपि / भले ही
एते
ये लोग
नहीं
पश्यन्ति
देखते
लोभोपहतचेतसः
लोभ से नष्ट बुद्धि वाले
कुलक्षयकृतम्
कुल के नाश से उत्पन्न
दोषम्
दोष को
मित्रद्रोहे
मित्रों से द्रोह में
पातकम्
पाप को

अर्जुन कहते हैं — भले ही ये लोग (कौरव पक्ष) लोभ के कारण अंधे हो गए हैं और उन्हें कुल के नाश से होने वाला दोष और मित्रों से द्रोह करने का पाप नहीं दिखता — यह उनकी भूल है।

यह ऐसे ही है जैसे लालच में डूबा व्यक्ति यह नहीं सोचता कि उसके काम से परिवार का क्या होगा। दुर्योधन और उसके साथियों की आँखों पर राज्य का लोभ पड़ा है — वे अपने ही कुल को मिटाने की ओर बढ़ रहे हैं, पर उन्हें इसका अहसास नहीं।

अर्जुन यहाँ कौरवों की नीयत और अपनी नीयत में अंतर बता रहे हैं — वे कहते हैं कि भले ही दूसरे अंधे हों, हमें तो सही-गलत दिखता है।

यह श्लोक और अगला श्लोक (1.39) मिलकर एक पूरा वाक्य बनाते हैं। अर्जुन पहले कहते हैं कि कौरव अंधे हैं (1.38), फिर कहते हैं कि हमें तो यह दोष दिखता है, इसलिए हमें इससे बचना चाहिए (1.39)।

'लोभोपहतचेतसः' — लोभ से नष्ट बुद्धि वाले — यह समास बहुत सटीक है। लोभ बुद्धि को ढँक लेता है, ठीक वैसे जैसे धुआँ आग को।

अध्याय 1 · 38 / 47
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