अर्जुन कहते हैं — भले ही ये लोग (कौरव पक्ष) लोभ के कारण अंधे हो गए हैं और उन्हें कुल के नाश से होने वाला दोष और मित्रों से द्रोह करने का पाप नहीं दिखता — यह उनकी भूल है।
यह ऐसे ही है जैसे लालच में डूबा व्यक्ति यह नहीं सोचता कि उसके काम से परिवार का क्या होगा। दुर्योधन और उसके साथियों की आँखों पर राज्य का लोभ पड़ा है — वे अपने ही कुल को मिटाने की ओर बढ़ रहे हैं, पर उन्हें इसका अहसास नहीं।
अर्जुन यहाँ कौरवों की नीयत और अपनी नीयत में अंतर बता रहे हैं — वे कहते हैं कि भले ही दूसरे अंधे हों, हमें तो सही-गलत दिखता है।