📿 श्लोक संग्रह

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुम्

गीता 1.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
तस्मात्
इसलिए
नहीं
अर्हाः
योग्य हैं
वयम्
हम
हन्तुम्
मारने के
धार्तराष्ट्रान्
धृतराष्ट्र के पुत्रों को
स्वबान्धवान्
अपने बन्धुओं को
स्वजनम्
अपने लोगों को
कथम्
कैसे
सुखिनः
सुखी
माधव
हे कृष्ण

अर्जुन कहते हैं — हे माधव, इसलिए हम अपने बान्धव धार्तराष्ट्रों को मारने के योग्य नहीं हैं। अपने ही लोगों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?

यह एक बहुत सीधा-सा तर्क है जो हर व्यक्ति समझ सकता है। जैसे परिवार में कोई झगड़ा हो जाए तो भले ही एक पक्ष जीत जाए, पर खुशी किसी को नहीं मिलती। जीतने वाला भी दुखी रहता है क्योंकि अपनों को हराया है।

अर्जुन यहाँ 'स्वबान्धवान्' शब्द का प्रयोग करते हैं — अर्थात ये केवल शत्रु नहीं, ये हमारे अपने बन्धु-बान्धव हैं। यह शब्द उनके दर्द को और गहरा बनाता है।

पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि आततायियों को मारने से भी पाप लगेगा। अब वे निष्कर्ष निकालते हैं कि इसलिए हमें इन्हें मारना ही नहीं चाहिए। अर्जुन का तर्क-क्रम स्पष्ट है — पहले कारण, फिर निष्कर्ष।

अध्याय 1 · 37 / 47
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