अर्जुन कहते हैं — हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या खुशी मिलेगी? इन आततायियों — यानी आक्रमणकारियों — को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।
यहाँ अर्जुन एक बहुत गहरा प्रश्न उठा रहे हैं। शास्त्र कहते हैं कि आततायी को दंड देना उचित है, लेकिन अर्जुन का हृदय कहता है कि ये आततायी भी तो अपने ही कुल के हैं। जैसे घर का कोई सदस्य गलत राह पर चल पड़े, तो उसे दंड देना कितना कठिन होता है!
अर्जुन की इस उलझन में धर्म और प्रेम का संघर्ष दिखता है — क्या सही है और क्या करना चाहिए, यह स्पष्ट नहीं रहा।