📿 श्लोक संग्रह

एतान्न हन्तुमिच्छामि

गीता 1.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
एतान्
इन सबको
नहीं
हन्तुम्
मारना
इच्छामि
चाहता हूँ
घ्नतः
मारने पर भी
अपि
भी
मधुसूदन
हे कृष्ण
त्रैलोक्यराज्यस्य
तीनों लोकों के राज्य के
हेतोः
लिए
महीकृते
पृथ्वी के लिए तो

अर्जुन कहते हैं — हे मधुसूदन, भले ही ये लोग मुझे मारें, फिर भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता। तीनों लोकों का राज्य मिल जाए तब भी नहीं, फिर इस छोटी-सी पृथ्वी के लिए तो बात ही क्या है!

यहाँ अर्जुन अपने प्रेम और करुणा को स्पष्ट करते हैं। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को कभी हानि नहीं पहुँचाना चाहती, चाहे बच्चा कितनी भी गलती करे — वैसे ही अर्जुन अपने कुल के लोगों को किसी भी कीमत पर नहीं मारना चाहते।

यह श्लोक अर्जुन की गहरी मानवीय संवेदना को दर्शाता है। वे एक ऐसे योद्धा हैं जिनका हृदय प्रेम से भरा है।

प्रथम अध्याय के इस भाग में अर्जुन का विषाद अपनी चरम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। वे एक-एक करके युद्ध न करने के तर्क रख रहे हैं। यहाँ वे कहते हैं कि स्वार्थ के लिए अपनों की हत्या किसी भी तर्क से उचित नहीं।

अध्याय 1 · 35 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 35 / 47 अगला →