अर्जुन कृष्ण से कहते हैं — मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। यह ऐसे ही है जैसे कोई व्यक्ति कहे कि भरा-पूरा भोजन रख दो, पर साथ खाने वाले अपने लोग न हों तो उस भोजन का क्या मोल?
अर्जुन आगे पूछते हैं — हे गोविन्द, राज्य से क्या होगा? भोगों से क्या होगा? यहाँ तक कि जीवन से भी क्या होगा? यह प्रश्न दिखाता है कि अर्जुन का मन इतना विचलित हो चुका है कि उन्हें सांसारिक सुख बिलकुल व्यर्थ लग रहे हैं।
यह वैराग्य नहीं, विषाद है — क्योंकि यह ज्ञान से नहीं, दुख और भ्रम से उपजा है। आगे कृष्ण इसी भ्रम को दूर करेंगे।