📿 श्लोक संग्रह

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम्

गीता 1.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥
पश्य
देखिए
एताम्
इस
पाण्डुपुत्राणाम्
पाण्डु के पुत्रों की
आचार्य
हे आचार्य
महतीम्
विशाल
चमूम्
सेना को
व्यूढाम्
व्यूह-रचना में सजी
द्रुपदपुत्रेण
द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्युम्न) द्वारा
तव
आपके
शिष्येण
शिष्य द्वारा
धीमता
बुद्धिमान

दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है — "हे आचार्य, पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य धृष्टद्युम्न ने व्यूह-रचना में सजाया है।" दुर्योधन के इन शब्दों में एक चतुर चाल छिपी है।

धृष्टद्युम्न राजा द्रुपद का पुत्र था और द्रोणाचार्य का शिष्य भी। द्रुपद और द्रोण में पुरानी शत्रुता थी। दुर्योधन यह कहकर द्रोणाचार्य को याद दिला रहा है कि उनका अपना शिष्य अब उनके विरुद्ध खड़ा है — ताकि गुरु के मन में क्रोध जागे और वे पूरी शक्ति से युद्ध करें।

यह राजनीतिक चतुराई का उदाहरण है। दुर्योधन जानता था कि युद्ध केवल तलवार से नहीं, बल्कि मन के उत्साह से भी जीता जाता है।

इस श्लोक से दुर्योधन का भाषण आरम्भ होता है जो अगले कई श्लोकों तक चलता है। वह पाण्डव-पक्ष और कौरव-पक्ष दोनों के महान योद्धाओं के नाम गिनाता है। यह वर्णन युद्ध के पूर्व के तनावपूर्ण वातावरण को जीवित कर देता है।

धृष्टद्युम्न का उल्लेख विशेष है क्योंकि उसका जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिए हुआ था — यह महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा है।

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