📿 श्लोक संग्रह

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा

गीता 1.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
अथ
इसके बाद
व्यवस्थितान्
व्यूह में खड़े हुए
दृष्ट्वा
देखकर
धार्तराष्ट्रान्
धृतराष्ट्र के पुत्रों को
कपिध्वजः
जिसके ध्वज पर हनुमान हैं (अर्जुन)
प्रवृत्ते
आरंभ होने पर
शस्त्रसम्पाते
शस्त्रों के चलने का समय
धनुः
धनुष
उद्यम्य
उठाकर
पाण्डवः
पाण्डुपुत्र (अर्जुन)

शंखनाद के बाद अब शस्त्र चलने का समय आ गया। अर्जुन — जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमानजी विराजमान हैं — ने सामने कौरव सेना को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखा और अपना गाण्डीव धनुष उठाया।

'कपिध्वज' अर्जुन का एक विशेष नाम है। कपि का अर्थ है वानर, अर्थात हनुमानजी। अर्जुन के रथ पर हनुमानजी का चिह्न था — यह उनकी अपार शक्ति और देवताओं के आशीर्वाद का प्रतीक है।

यह क्षण बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी अर्जुन पूरे आत्मविश्वास से युद्ध के लिए तैयार दिख रहे हैं। लेकिन अगले ही श्लोकों में वे कृष्ण से एक ऐसा निवेदन करेंगे जो उनके जीवन और पूरी गीता की दिशा बदल देगा।

यह श्लोक कथा में एक मोड़ है। अब तक दुर्योधन और संजय बोल रहे थे — अब पहली बार अर्जुन सक्रिय होते हैं। वे धनुष उठाते हैं, लेकिन तीर चलाने से पहले वे कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहेंगे।

परंपरा में हनुमानजी का अर्जुन के ध्वज पर होना रामायण और महाभारत के बीच एक पवित्र सेतु माना जाता है।

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