पांडव पक्ष के शंखों की वह भयंकर ध्वनि आकाश और पृथ्वी दोनों को गुंजा उठी। इतना ज़ोरदार शोर हुआ कि कौरवों के हृदय काँप उठे। जैसे बरसात में अचानक बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर मन सहम जाता है, वैसे ही उस शंखनाद ने शत्रु पक्ष में भय पैदा कर दिया।
यहाँ 'व्यदारयत्' शब्द बहुत सशक्त है — इसका अर्थ है 'चीर डालना'। अर्थात वह ध्वनि इतनी प्रबल थी कि कौरवों के हृदय फट-से जाने लगे। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस क्षण की भयावहता का काव्यात्मक वर्णन है।
इस श्लोक के साथ शंखनाद का प्रकरण पूरा होता है और अब कथा अगले चरण में प्रवेश करती है जहाँ अर्जुन रणभूमि का अवलोकन करने की इच्छा प्रकट करते हैं।