📿 श्लोक संग्रह

स घोषो धार्तराष्ट्राणाम्

गीता 1.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥
सः
वह
घोषः
भयंकर ध्वनि
धार्तराष्ट्राणाम्
धृतराष्ट्र के पुत्रों के
हृदयानि
हृदयों को
व्यदारयत्
विदीर्ण कर दिया (चीर दिया)
नभः
आकाश
पृथिवीम्
पृथ्वी को
तुमुलः
भयंकर, ज़ोरदार
व्यनुनादयन्
गूँजा दिया

पांडव पक्ष के शंखों की वह भयंकर ध्वनि आकाश और पृथ्वी दोनों को गुंजा उठी। इतना ज़ोरदार शोर हुआ कि कौरवों के हृदय काँप उठे। जैसे बरसात में अचानक बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर मन सहम जाता है, वैसे ही उस शंखनाद ने शत्रु पक्ष में भय पैदा कर दिया।

यहाँ 'व्यदारयत्' शब्द बहुत सशक्त है — इसका अर्थ है 'चीर डालना'। अर्थात वह ध्वनि इतनी प्रबल थी कि कौरवों के हृदय फट-से जाने लगे। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस क्षण की भयावहता का काव्यात्मक वर्णन है।

इस श्लोक के साथ शंखनाद का प्रकरण पूरा होता है और अब कथा अगले चरण में प्रवेश करती है जहाँ अर्जुन रणभूमि का अवलोकन करने की इच्छा प्रकट करते हैं।

पहले अध्याय के इस खंड में दुर्योधन ने अपनी सेना के वीरों को गिनाया, फिर पांडवों ने शंख बजाए। अब इस श्लोक में उस शंखनाद का प्रभाव बताया गया है — कौरवों के हृदय दहल गए। यह पांडव पक्ष की नैतिक और सैनिक ताक़त का प्रतीक है।

साहित्यिक दृष्टि से यह श्लोक एक सेतु का काम करता है — शंखनाद के वर्णन से अर्जुन के विषाद के वर्णन की ओर कथा मोड़ लेती है।

अध्याय 1 · 19 / 47
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