📿 श्लोक संग्रह

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च

गीता 1.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥
द्रुपदः
राजा द्रुपद
द्रौपदेयाः
द्रौपदी के पुत्र
और
सर्वशः
सब ओर से
पृथिवीपते
हे राजन (धृतराष्ट्र)
सौभद्रः
सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु)
महाबाहुः
विशाल भुजाओं वाला
शङ्खान्
शंखों को
दध्मुः
बजाया
पृथक्पृथक्
अलग-अलग

संजय बताते हैं कि राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु — इन सबने अलग-अलग अपने शंख बजाए। शंख बजाना युद्ध की तैयारी का संकेत है, जैसे आज की सेनाओं में बिगुल बजता है।

ध्यान दें कि अभिमन्यु को 'महाबाहु' कहा गया है — अर्थात कम उम्र में भी वे बड़े बलशाली और पराक्रमी थे। अर्जुन और सुभद्रा का यह पुत्र आगे चलकर चक्रव्यूह में अपनी अद्भुत वीरता दिखाता है।

इस श्लोक से पांडव पक्ष के शंखनाद का वर्णन पूरा होता है। चारों ओर से उठती शंखों की ध्वनि ने पूरी रणभूमि को गुंजा दिया।

यह श्लोक पिछले कुछ श्लोकों की शंखनाद-श्रृंखला को पूरा करता है। पहले भगवान कृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त, भीम ने पौण्ड्र शंख बजाया — और अब शेष सभी योद्धाओं ने भी अपने-अपने शंख बजाए।

संजय 'पृथिवीपते' कहकर धृतराष्ट्र को सीधे संबोधित करते हैं, जिससे कथा में एक नाटकीय प्रभाव आता है — मानो कह रहे हों कि 'हे राजन, सुनिए, आपके विपक्ष में कितनी भारी शक्ति खड़ी है।'

अध्याय 1 · 18 / 47
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