वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका में युद्ध चल रहा था। राम की वानर-सेना रावण की सेना से लड़ रही थी। एक रात इंद्रजीत ने शक्ति-शस्त्र चलाया। वह शस्त्र सीधे लक्ष्मण को लगा।
लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। उनके शरीर में प्राण तो थे, पर वे उठ नहीं पा रहे थे। सेना में घबराहट फैल गई। राम के पास जाकर वीर-वानरों ने बताया। राम का हृदय भर आया।
वैद्यराज सुषेण बुलाए गए। उन्होंने लक्ष्मण की स्थिति देखी। फिर गंभीर स्वर में बोले — हिमालय पर्वत पर द्रोणाचल नामक पर्वत है। वहाँ संजीवनी नामक बूटी उगती है। वही एकमात्र उपाय है। पर रात समाप्त होने से पहले लानी होगी।
सभी की दृष्टि हनुमान पर टिक गई। हनुमान ने राम को प्रणाम किया। वे उड़ चले — उत्तर की ओर, हिमालय की ओर।
हनुमान द्रोणाचल पर्वत पर पहुँचे। वहाँ अनेक जड़ी-बूटियाँ थीं। पर रात के अँधेरे में, समय की कमी में, हनुमान संजीवनी को पहचान न सके। बूटियाँ एक-सी दिखती थीं।
हनुमान ने एक पल सोचा। फिर उन्होंने वह पूरा पर्वत-शिखर ही उठा लिया। दोनों हाथों से उठाया। और लंका की ओर उड़ चले — पहाड़ को लेकर।
वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि हनुमान पर्वत लेकर लंका पहुँचे। वैद्यराज सुषेण ने उस पर्वत में से संजीवनी पहचानी। उसे तैयार किया। और लक्ष्मण को दिया।
लक्ष्मण की आँखें खुलीं। वे उठे। उनके शरीर में फिर से बल आ गया। राम ने लक्ष्मण को गले लगाया। सेना में हर्षध्वनि उठी।
हनुमान चुपचाप खड़े थे। उनके चेहरे पर कोई गर्व नहीं था — बस संतोष था।