वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब सीता की खोज का काम वानर-सेना को सौंपा गया, तो दक्षिण दिशा की ओर गई टोली में हनुमान भी थे। समुद्र के किनारे पहुँचकर सभी रुक गए। समुद्र विशाल था। उसे पार करना असंभव लग रहा था।
तब जामवंत ने हनुमान से कहा — तुम्हें याद नहीं, तुम कितने शक्तिशाली हो? बचपन में तुमने सूर्य को फल समझकर पकड़ने की कोशिश की थी। वह शक्ति अभी भी तुम्हारे भीतर है। हनुमान को अपनी शक्ति स्मरण हो आई।
हनुमान ने एक ऊँची चट्टान पर चढ़कर अपना शरीर बड़ा किया। उन्होंने गहरी साँस ली। और एक जोरदार छलाँग लगाई। वे आकाश में उड़ चले — लंका की ओर।
रास्ते में समुद्र से एक पर्वत ऊपर उठा। उसका नाम था मैनाक। उसने कहा — हनुमान, रुको। विश्राम करो। तुम्हारे पिता वायुदेव के मित्र हूँ मैं। हनुमान ने उस पर्वत का स्पर्श किया, उसका सम्मान किया। पर रुके नहीं — कार्य आगे बुला रहा था।
आगे बढ़े तो एक बड़ी छाया मिली। यह सुरसा थी। देवताओं ने उसे परीक्षा के लिए भेजा था। सुरसा ने मुँह फैलाया। हनुमान ने भी अपना शरीर बड़ा किया। सुरसा और बड़ी हुई। हनुमान और बड़े हुए। फिर हनुमान अचानक छोटे हो गए — अँगूठे जितने। सुरसा के मुँह में घुसे और तुरंत बाहर निकल आए। परीक्षा पूरी हुई।
वाल्मीकि रामायण में आगे बताया गया है कि उड़ान में एक और बाधा आई — छाया को खींचने वाली सिंहिका। उसने हनुमान की परछाईं पकड़ ली। हनुमान ने साहस से उसका सामना किया और आगे बढ़े।
अंततः हनुमान लंका के किनारे पहुँचे। उन्होंने समुद्र पार कर लिया था। अपना शरीर फिर छोटा किया। और चुपचाप लंका के भीतर प्रवेश किया। रात का समय था।
लंका सोने की थी — उसकी दीवारें चमकती थीं। पर हनुमान का मन उस चमक में नहीं था। उन्हें सीता माँ को ढूँढना था। वे आगे बढ़ते रहे — सावधानी से, चुपचाप।