वाल्मीकि रामायण के अनुसार, वन-वास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण दंडकारण्य के घने वनों में विचरते रहे। ऋषि-मुनियों से मार्गदर्शन लेते हुए वे आगे बढ़ते रहे। एक दिन महर्षि अगस्त्य के आश्रम से विदा होकर वे गोदावरी नदी के तट पर पहुँचे।
महर्षि अगस्त्य ने राम को बताया था — गोदावरी के निकट पंचवटी नामक स्थान है। वहाँ पाँच वट-वृक्ष हैं। वहाँ की भूमि शांत है, जल स्वच्छ है, और ऋषियों का आना-जाना लगा रहता है। तुम वहाँ कुटी बना सकते हो।
राम, सीता और लक्ष्मण पंचवटी पहुँचे। गोदावरी का जल निर्मल था। तट पर बड़े-बड़े वट-वृक्ष थे जिनकी छाया दूर तक फैली थी। पक्षियों का कलरव था। वायु सुखद थी।
लक्ष्मण ने परिश्रम से कुटी बनाई। मिट्टी और बाँस से दो कक्ष तैयार किए। छत पर घास बिछाई। राम ने देखा और प्रसन्न हुए। सीता ने उस छोटी कुटी को अपने हाथों से सजाया।
वहाँ के दिन शांत थे। सुबह होती तो गोदावरी की लहरों की आवाज आती। राम प्रातः स्नान करते, संध्या-वंदन करते। सीता आश्रम के छोटे बगीचे की देखभाल करतीं। लक्ष्मण पहरेदारी करते।
वन में विचरते ऋषि-मुनि कभी-कभी उनकी कुटी पर आते। राम उन्हें प्रणाम करते, उनकी बातें सुनते। ऋषि बताते — इस वन में कई तीर्थ हैं। गोदावरी के इस तट पर पूर्वजों ने तप किया है।
सीता को उस वन-जीवन में कठिनाई नहीं लगती थी। वे कहतीं — जहाँ आप हैं, वहीं मेरा घर है। जंगल में भी आनंद है, यदि मन शांत हो। लक्ष्मण अपने बड़े भाई की सेवा में सदा तत्पर रहते।
पंचवटी की वे पाँचों वटवृक्षों की छाया में बैठ कर शाम बिताते। गोदावरी में सूर्यास्त के समय लाल रंग उतर आता था। उस निर्जन वन में भी एक घर जैसा भाव था।