वाल्मीकि रामायण के अनुसार, मिथिला के राजा जनक के पास एक अद्भुत धनुष था। यह धनुष भगवान शिव का था — पिनाक नाम से जाना जाता था। यह इतना भारी था कि सैकड़ों पुरुष मिलकर भी उसे हिला नहीं पाते थे।
राजा जनक की पुत्री सीता थीं। जब सीता छोटी थीं, तब एक बार खेलते-खेलते उन्होंने उस भारी संदूक को सरका दिया था — जिसमें वह धनुष रखा था। राजा जनक आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने मन में निश्चय किया — जो इस धनुष को उठा सके, वही सीता का वर बनेगा।
स्वयंवर का आयोजन हुआ। दूर-दूर से राजा-महाराजा मिथिला पधारे। एक से बढ़कर एक वीर योद्धा आए। सभा सजी थी, नगर उत्सव में था।
महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ मिथिला लाए थे। दोनों भाई उस समय युवा थे। राम की आँखों में शांति थी, चाल में स्थिरता थी।
एक-एक करके राजा उठे और उस धनुष के पास गए। कोई उसे छू भी न सका। कोई हिला न सका। कुछ तो प्रयास करके लौट आए, मुँह छुपाते हुए।
महर्षि विश्वामित्र ने राम को आज्ञा दी। राम उठे। उन्होंने विनम्रता से गुरु और माता-पिता को स्मरण किया। वे धनुष के पास गए। उन्होंने उसे उठाया — जैसे कोई सामान्य वस्तु उठाते हों।
राम ने उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया। प्रत्यंचा खिंची। और एक जोरदार आवाज के साथ वह धनुष दो भागों में टूट गया। उस आवाज से सारी सभा काँप उठी।
राजा जनक की आँखें भर आईं। वे उठे और राम के पास आए। उन्होंने घोषणा की — सीता का विवाह राम से होगा। नगर में शंख बज उठे। फूल बरसाए गए।
महर्षि विश्वामित्र मुस्कुराए। लक्ष्मण के चेहरे पर गर्व था। और सीता की दृष्टि शांत थी — जैसे उन्हें पहले से पता हो कि यही होगा।