वाल्मीकि रामायण के अनुसार, बहुत समय पहले की बात है। अयोध्या नगरी में राजा दशरथ राज करते थे। उनके पास सब कुछ था — विशाल राज्य, वीर सेना, प्रजा का प्रेम। पर एक बात उन्हें सदा उदास रखती थी। उनका कोई पुत्र नहीं था।
राजा दशरथ ने महर्षि वशिष्ठ से विचार किया। महर्षि ने कहा — पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाइए। ऋष्यशृंग मुनि इस यज्ञ को करवा सकते हैं। राजा ने तुरंत ऋष्यशृंग मुनि को आमंत्रित किया।
यज्ञ की तैयारी होने लगी। देश-विदेश के राजा और ऋषि-मुनि अयोध्या पधारे। यज्ञशाला में वेदमंत्रों की ध्वनि गूँज उठी। दिनों तक यज्ञ चलता रहा।
यज्ञ की समाप्ति पर अग्निकुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथ में सोने का पात्र था। उसमें खीर भरी थी। उन्होंने वह पात्र राजा दशरथ को दिया और कहा — इसे अपनी तीनों रानियों में बाँट दीजिए।
राजा दशरथ की तीन रानियाँ थीं — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राजा ने खीर का आधा भाग कौशल्या को दिया। उसका आधा कैकेयी को दिया। और जो बचा, उसे दो भागों में बाँट कर सुमित्रा को दे दिया।
कुछ महीने बीते। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। मध्याह्न का समय था। आकाश निर्मल था। कौशल्या के कक्ष में बालक का जन्म हुआ। वह बालक तेजस्वी था, शांत था। उनका नाम रखा गया — राम।
उसी दिन कैकेयी के यहाँ भरत का जन्म हुआ। और सुमित्रा के यहाँ दो पुत्र हुए — लक्ष्मण और शत्रुघ्न। पूरी अयोध्या में खुशियाँ छा गईं। नगर के द्वारों पर फूलों की मालाएँ सजाई गईं।
राजा दशरथ की आँखों में आँसू आ गए। वर्षों की प्रतीक्षा पूरी हो गई थी। उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिया, प्रजा में मिठाइयाँ बँटवाईं। अयोध्या की गलियाँ उस दिन उत्सव से भरी रहीं।