📿 श्लोक संग्रह

हिरण्यवर्णां हरिणीं

ऋग्वेद खिल सूक्त (श्री सूक्त 1) वैदिक मंत्र
📖 ऋग्वेद, खिल सूक्त — श्री सूक्त
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
हिरण्यवर्णाम्
सुनहरे वर्ण वाली
हरिणीम्
हरित (सुंदर) आभा वाली
सुवर्णरजतस्रजाम्
सोने-चाँदी की मालाओं वाली
चन्द्राम्
चन्द्रमा की तरह शीतल
हिरण्मयीम्
स्वर्णमयी
लक्ष्मीम्
लक्ष्मी को
जातवेदः
हे अग्निदेव (जातवेदा)
मा
मेरे लिए
आवह
ले आओ, बुलाओ

श्री सूक्त वैदिक साहित्य में लक्ष्मी देवी का सबसे प्राचीन स्तोत्र माना जाता है। इसके पहले मंत्र में अग्निदेव से प्रार्थना की गई है कि वे लक्ष्मी देवी को बुलाकर लाएँ। लक्ष्मी का वर्णन किया गया है — उनका रंग सुनहरा है, वे सोने-चाँदी की मालाओं से सुशोभित हैं।

उन्हें 'चन्द्रा' कहा गया है — अर्थात चन्द्रमा की तरह शीतल और सुखद। जैसे चाँदनी रात में शांत प्रकाश देती है, वैसे ही लक्ष्मी का आगमन घर में शांति और समृद्धि लाता है। उन्हें 'हिरण्मयी' कहा गया — जो स्वयं स्वर्ण-स्वरूपा हैं।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं — परंपरा में उन्हें समृद्धि, सौभाग्य, कल्याण और गृहस्थ जीवन की पूर्णता का प्रतीक माना जाता रहा है।

श्री सूक्त ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) भाग में मिलता है। इसमें 15-16 मंत्र हैं जो लक्ष्मी की स्तुति करते हैं। परंपरा में श्री सूक्त का पाठ विशेष अवसरों पर किया जाता रहा है।

इस सूक्त में अग्नि को माध्यम बनाकर लक्ष्मी का आह्वान किया गया है, जो वैदिक यज्ञ-परंपरा को दर्शाता है — अग्नि देवताओं तक प्रार्थना पहुँचाने का माध्यम मानी जाती रही है।

वैदिक मंत्र · 6 / 8
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