नारायण सूक्त का यह पहला मंत्र नारायण देव का भव्य परिचय देता है। उनके सहस्र सिर हैं — अर्थात वे अनंत हैं। वे विश्वाक्ष हैं — पूरे विश्व को देखने वाले। और विश्वशम्भु हैं — पूरे विश्व का कल्याण करने वाले।
फिर कहा गया है कि यह पूरा विश्व ही नारायण है — वे सब कुछ हैं। वे अक्षर (अविनाशी) हैं और परम पद (सबसे ऊँचा लक्ष्य) हैं। जैसे सागर में सारी नदियाँ समाती हैं, वैसे ही नारायण में सारी सृष्टि समाई हुई है।
यह मंत्र पुरुषसूक्त से मिलता-जुलता है — दोनों में विराट परमात्मा का वर्णन है। लेकिन नारायण सूक्त में विशेष रूप से नारायण नाम का प्रयोग है और उन्हें परम पद कहा गया है।