📿 श्लोक संग्रह

सहस्रशीर्षं देवं

तैत्तिरीय आरण्यक 10 (नारायण सूक्त 1) वैदिक मंत्र
📖 तैत्तिरीय आरण्यक, महानारायणोपनिषद्
सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।
विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥
सहस्रशीर्षम्
सहस्र (अनगिनत) सिर वाले
देवम्
देव को
विश्वाक्षम्
विश्व को देखने वाले
विश्वशम्भुवम्
विश्व का कल्याण करने वाले
विश्वम्
विश्व-स्वरूप
नारायणम्
नारायण
अक्षरम्
अविनाशी
परमम्
सर्वोच्च
पदम्
स्थान, लक्ष्य

नारायण सूक्त का यह पहला मंत्र नारायण देव का भव्य परिचय देता है। उनके सहस्र सिर हैं — अर्थात वे अनंत हैं। वे विश्वाक्ष हैं — पूरे विश्व को देखने वाले। और विश्वशम्भु हैं — पूरे विश्व का कल्याण करने वाले।

फिर कहा गया है कि यह पूरा विश्व ही नारायण है — वे सब कुछ हैं। वे अक्षर (अविनाशी) हैं और परम पद (सबसे ऊँचा लक्ष्य) हैं। जैसे सागर में सारी नदियाँ समाती हैं, वैसे ही नारायण में सारी सृष्टि समाई हुई है।

यह मंत्र पुरुषसूक्त से मिलता-जुलता है — दोनों में विराट परमात्मा का वर्णन है। लेकिन नारायण सूक्त में विशेष रूप से नारायण नाम का प्रयोग है और उन्हें परम पद कहा गया है।

नारायण सूक्त तैत्तिरीय आरण्यक के दसवें प्रपाठक में आता है, जिसे महानारायणोपनिषद् भी कहा जाता है। यह कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित है।

परंपरा में नारायण सूक्त का पाठ विष्णु-पूजा और विशेष अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। इसे पुरुषसूक्त के साथ मिलाकर पढ़ने की प्रथा भी रही है।

वैदिक मंत्र · 7 / 8
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