📿 श्लोक संग्रह

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो

विष्णु सहस्रनाम 1 पुराण स्तोत्र
📖 महाभारत, अनुशासन पर्व
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥
विश्वम्
सम्पूर्ण विश्व
विष्णुः
सर्वव्यापी
वषट्कारः
यज्ञ में 'वषट्' मंत्र के अधिष्ठाता
भूतभव्यभवत्प्रभुः
भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी
भूतकृत्
प्राणियों के रचयिता
भूतभृत्
प्राणियों का पालन करने वाले
भावः
स्वयं सत्ता-स्वरूप
भूतात्मा
सब प्राणियों की आत्मा
भूतभावनः
सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाले

विष्णु सहस्रनाम का यह पहला श्लोक है। इसमें भगवान विष्णु के पहले नौ नाम आए हैं। हर नाम उनके एक गुण को बताता है। जैसे 'विश्वम्' का अर्थ है कि यह पूरा विश्व उन्हीं का रूप है, और 'विष्णुः' का अर्थ है कि वे सर्वत्र व्याप्त हैं।

इसे ऐसे समझो — जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए कभी खाना बनाती है, कभी लोरी सुनाती है, कभी सिखाती है — एक ही माँ कई रूपों में काम करती है। वैसे ही भगवान विष्णु एक ही हैं, लेकिन उनके अनगिनत नाम उनके अनगिनत कामों को बताते हैं।

इस श्लोक में 'भूतकृत्' (बनाने वाले), 'भूतभृत्' (पालने वाले), और 'भूतभावनः' (उत्पन्न करने वाले) — ये तीन नाम मिलकर बताते हैं कि सृष्टि का बनाना, चलाना और पालना — तीनों काम भगवान करते हैं।

विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व में आता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए थे। युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि सबसे बड़ा धर्म क्या है और किसका स्मरण करने से मनुष्य को शांति मिलती है। तब भीष्म ने विष्णु के सहस्र (एक हज़ार) नामों का यह स्तोत्र सुनाया।

परंपरा में विष्णु सहस्रनाम को बहुत पवित्र स्तोत्र माना जाता रहा है। यह सहस्रनाम 108 श्लोकों में विभाजित है और इसमें भगवान विष्णु के 1000 नाम हैं।

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