यह शिव तांडव स्तोत्र का पहला श्लोक है। इसमें भगवान शिव के तांडव नृत्य का ऐसा वर्णन है जो पढ़ते ही आँखों के सामने दृश्य बन जाता है। कल्पना करो — शिव की घनी जटाओं से गंगा की धारा बह रही है, गले में बड़े-बड़े साँपों की माला लटक रही है, और डमरू की 'डम-डम' ध्वनि गूँज रही है।
इस दृश्य में एक लय है — 'डमड्डमड्डमड्डमत्' — यह शब्द ही डमरू की आवाज़ जैसा सुनाई देता है। जब इसे बोलो तो लगता है जैसे सचमुच डमरू बज रहा है। इस श्लोक की भाषा में ही संगीत छिपा हुआ है।
अंत में कहा गया है — ऐसे प्रचण्ड तांडव करने वाले शिव हम सबका कल्याण करें। यहाँ 'शिवम्' शब्द का अर्थ ही है मंगल, कल्याण। भगवान शिव का नाम ही शुभ है।