📿 श्लोक संग्रह

जटाटवीगलज्जलप्रवाह

शिव तांडव स्तोत्र 1 पुराण स्तोत्र
📖 परंपरा में रावण द्वारा रचित माना जाता है
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥
जटाटवी
जटाओं का घना जंगल
गलत्
बहता हुआ
जलप्रवाह
जल की धारा (गंगा)
पावितस्थले
पवित्र किए हुए स्थान पर
गले
गले में
अवलम्ब्य
लटकाकर
भुजङ्ग
साँप
तुङ्गमालिकाम्
ऊँची माला
डमड्डमड्डमड्डमत्
डमरू की ध्वनि
निनाद
गूँज
चण्डताण्डवम्
प्रचण्ड तांडव नृत्य
तनोतु
फैलाए, प्रदान करे
शिवम्
कल्याण, मंगल

यह शिव तांडव स्तोत्र का पहला श्लोक है। इसमें भगवान शिव के तांडव नृत्य का ऐसा वर्णन है जो पढ़ते ही आँखों के सामने दृश्य बन जाता है। कल्पना करो — शिव की घनी जटाओं से गंगा की धारा बह रही है, गले में बड़े-बड़े साँपों की माला लटक रही है, और डमरू की 'डम-डम' ध्वनि गूँज रही है।

इस दृश्य में एक लय है — 'डमड्डमड्डमड्डमत्' — यह शब्द ही डमरू की आवाज़ जैसा सुनाई देता है। जब इसे बोलो तो लगता है जैसे सचमुच डमरू बज रहा है। इस श्लोक की भाषा में ही संगीत छिपा हुआ है।

अंत में कहा गया है — ऐसे प्रचण्ड तांडव करने वाले शिव हम सबका कल्याण करें। यहाँ 'शिवम्' शब्द का अर्थ ही है मंगल, कल्याण। भगवान शिव का नाम ही शुभ है।

शिव तांडव स्तोत्र की रचना परंपरा में लंकापति रावण द्वारा की गई मानी जाती है। कहा जाता है कि रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था और उसने यह स्तोत्र शिव की स्तुति में रचा।

यह स्तोत्र अपनी लयबद्धता और ध्वन्यात्मकता के लिए प्रसिद्ध है। इसके प्रत्येक श्लोक में एक विशेष छंद है जो पढ़ने पर नृत्य की ताल जैसा सुनाई देता है।

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