📿 श्लोक संग्रह

जातवेदसे सुनवाम

तैत्तिरीय आरण्यक 10 (दुर्गा सूक्त 1) वैदिक मंत्र
📖 तैत्तिरीय आरण्यक, महानारायणोपनिषद्
जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः ।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥
जातवेदसे
जातवेदा (अग्निदेव) के लिए
सुनवाम
हम सोमरस निचोड़ें
सोमम्
सोमरस
अरातीयतः
शत्रुता करने वालों को
निदहाति
जला देता है
वेदः
ज्ञानस्वरूप (अग्नि)
सः नः
वह हमें
पर्षत्
पार कराए
अति
परे
दुर्गाणि
दुर्गम बाधाओं से
विश्वा
सब
नावा इव
नाव की तरह
सिन्धुम्
सागर को
दुरितात्
पापों से, कठिनाइयों से
अग्निः
अग्नि

दुर्गा सूक्त का यह पहला मंत्र अग्निदेव (जातवेदा) की स्तुति करता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे हमें सब दुर्गम बाधाओं से पार कराएँ। 'दुर्गा' शब्द यहीं से आया है — 'दुर्ग' अर्थात कठिन, और जो कठिनाइयों से पार कराए वह दुर्गा।

मंत्र में एक सुंदर उपमा है — जैसे नाव सागर को पार कराती है, वैसे ही अग्निदेव हमें कठिनाइयों के सागर से पार लगाते हैं। जब कोई बच्चा तैरना नहीं जानता और नदी पार करनी हो, तो नाव ही सहारा होती है। वैसे ही जीवन की मुश्किलों में ईश्वर वह नाव है।

अग्नि को 'वेदः' (ज्ञानस्वरूप) कहा गया है — वे शत्रुता करने वालों को जला देते हैं। यहाँ शत्रु बाहरी नहीं, भीतरी हैं — अज्ञान, भय, कठिनाई। ज्ञान की अग्नि इन सबको भस्म कर देती है।

दुर्गा सूक्त तैत्तिरीय आरण्यक के दसवें प्रपाठक (महानारायणोपनिषद्) में मिलता है। इसमें मूलतः अग्नि देवता की स्तुति है, लेकिन परंपरा में इसे दुर्गा देवी से जोड़कर पढ़ा जाता रहा है।

परंपरा में नवरात्रि और देवी-पूजन के अवसर पर दुर्गा सूक्त का पाठ विशेष रूप से प्रचलित रहा है।

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