दुर्गा सूक्त का यह पहला मंत्र अग्निदेव (जातवेदा) की स्तुति करता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे हमें सब दुर्गम बाधाओं से पार कराएँ। 'दुर्गा' शब्द यहीं से आया है — 'दुर्ग' अर्थात कठिन, और जो कठिनाइयों से पार कराए वह दुर्गा।
मंत्र में एक सुंदर उपमा है — जैसे नाव सागर को पार कराती है, वैसे ही अग्निदेव हमें कठिनाइयों के सागर से पार लगाते हैं। जब कोई बच्चा तैरना नहीं जानता और नदी पार करनी हो, तो नाव ही सहारा होती है। वैसे ही जीवन की मुश्किलों में ईश्वर वह नाव है।
अग्नि को 'वेदः' (ज्ञानस्वरूप) कहा गया है — वे शत्रुता करने वालों को जला देते हैं। यहाँ शत्रु बाहरी नहीं, भीतरी हैं — अज्ञान, भय, कठिनाई। ज्ञान की अग्नि इन सबको भस्म कर देती है।