यह देवीमाहात्म्य का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। इसमें कहा गया है कि जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार। तीन बार 'नमस्तस्यै' कहा गया है — यह तीन बार का नमस्कार पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
देवीमाहात्म्य में यह श्लोक अनेक रूपों में दोहराया गया है — शक्तिरूपेण, बुद्धिरूपेण, निद्रारूपेण, क्षुधारूपेण, श्रद्धारूपेण। अर्थात हमारे भीतर जो शक्ति है, जो बुद्धि है, जो नींद है, जो भूख है, जो श्रद्धा है — सब देवी के रूप हैं।
कितनी सुंदर बात है — जब कोई माँ अपने बच्चे की रक्षा के लिए सारी शक्ति लगा देती है, तो वह शक्ति कहाँ से आती है? वह देवी का ही रूप है। जब कोई बुज़ुर्ग कठिन समय में धैर्य रखता है — वह धैर्य भी देवी की शक्ति है।