📿 श्लोक संग्रह

या देवी सर्वभूतेषु

देवीमाहात्म्य, मार्कण्डेय पुराण पुराण स्तोत्र
📖 मार्कण्डेय पुराण, देवीमाहात्म्य
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
या
जो
देवी
देवी
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
शक्तिरूपेण
शक्ति के रूप में
संस्थिता
स्थित हैं, विराजमान हैं
नमस्तस्यै
उन्हें नमस्कार
नमो नमः
बार-बार नमस्कार

यह देवीमाहात्म्य का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। इसमें कहा गया है कि जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार। तीन बार 'नमस्तस्यै' कहा गया है — यह तीन बार का नमस्कार पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।

देवीमाहात्म्य में यह श्लोक अनेक रूपों में दोहराया गया है — शक्तिरूपेण, बुद्धिरूपेण, निद्रारूपेण, क्षुधारूपेण, श्रद्धारूपेण। अर्थात हमारे भीतर जो शक्ति है, जो बुद्धि है, जो नींद है, जो भूख है, जो श्रद्धा है — सब देवी के रूप हैं।

कितनी सुंदर बात है — जब कोई माँ अपने बच्चे की रक्षा के लिए सारी शक्ति लगा देती है, तो वह शक्ति कहाँ से आती है? वह देवी का ही रूप है। जब कोई बुज़ुर्ग कठिन समय में धैर्य रखता है — वह धैर्य भी देवी की शक्ति है।

देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) मार्कण्डेय पुराण का भाग है और इसमें 700 श्लोक हैं। इसमें देवी महिषासुरमर्दिनी की कथा और स्तुतियाँ हैं। 'या देवी सर्वभूतेषु' वाली स्तुति इसके पाँचवें अध्याय में आती है।

नवरात्रि के दौरान देवीमाहात्म्य का पूरा पाठ करने की परंपरा रही है। यह श्लोक सबसे अधिक लोकप्रिय और सुनने में आने वाला श्लोक है।

पुराण स्तोत्र · 7 / 8
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