📿 श्लोक संग्रह

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं

लिंगाष्टकम् 1 पुराण स्तोत्र
📖 शैव स्तोत्र परंपरा
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं
निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥
ब्रह्म
ब्रह्मा
मुरारि
मुरारि (विष्णु)
सुर
देवताओं द्वारा
अर्चित
पूजित
लिङ्गम्
शिवलिंग
निर्मलभासित
निर्मल प्रकाश से चमकता हुआ
शोभित
सुशोभित
जन्मज
जन्म से उत्पन्न
दुःखविनाशक
दुःखों को नष्ट करने वाला
तत्
उस
प्रणमामि
मैं प्रणाम करता हूँ
सदाशिवलिङ्गम्
सदाशिव के लिंग को

लिंगाष्टकम् शिवलिंग की स्तुति के आठ श्लोकों का स्तोत्र है। इसके पहले श्लोक में बताया गया है कि यह शिवलिंग ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और समस्त देवताओं द्वारा पूजित है। अर्थात सृष्टि के रचयिता और पालनकर्ता भी इस लिंग की पूजा करते हैं।

यह लिंग निर्मल प्रकाश से शोभित है — जैसे सुबह का पहला सूर्यप्रकाश शुद्ध और निर्मल होता है, वैसे ही शिवलिंग की आभा पवित्र और शांत है। और यह लिंग जन्म से आए सब दुःखों का नाश करने वाला है।

हर पंक्ति के अंत में 'लिङ्गम्' शब्द आता है — यह पूरे स्तोत्र में एक लय बनाता है। और अंत में कहा गया — ऐसे सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। यह सरल भक्ति है — देखो, समझो, और प्रणाम करो।

लिंगाष्टकम् शैव स्तोत्र परंपरा का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें आठ श्लोक हैं और प्रत्येक श्लोक में शिवलिंग के एक विशेष गुण का वर्णन किया गया है।

शिवलिंग की पूजा भारतीय उपासना-परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन अंग रही है। बारह ज्योतिर्लिंग इसी परंपरा के सबसे प्रमुख केंद्र माने जाते रहे हैं।

पुराण स्तोत्र · 8 / 8
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