📿 श्लोक संग्रह

नमस्ते रुद्र मन्यव

श्री रुद्रम्, नमकम् 1 पुराण स्तोत्र
📖 कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता 4.5
नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः ।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः ॥
नमः
नमस्कार
ते
आपको
रुद्र
हे रुद्र (शिव)
मन्यवे
क्रोध को
उतो
और भी
इषवे
बाण को
अस्तु
हो
धन्वने
धनुष को
बाहुभ्याम्
दोनों बाहुओं को

श्री रुद्रम् वैदिक साहित्य में भगवान रुद्र (शिव) की सबसे प्रमुख स्तुति है। इसका पहला मंत्र अत्यंत विनम्र है — हे रुद्र, आपके क्रोध को नमस्कार! आपके बाण को नमस्कार! आपके धनुष को नमस्कार! और आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार!

यह स्तुति अनोखी है क्योंकि यहाँ भक्त भगवान की कोमलता को ही नहीं, बल्कि उनके भयंकर रूप को भी नमस्कार कर रहा है। जैसे एक बच्चा अपने पिता से कहे — पापा, आपकी डाँट को भी नमस्कार, क्योंकि वह भी मेरी भलाई के लिए है। रुद्र का क्रोध भी कल्याण के लिए है।

हर चीज़ को 'नमः' कहना — यह पूर्ण समर्पण है। न केवल सुख को, बल्कि कठिनाई को भी स्वीकार करना। यह वैदिक भक्ति की विशेषता है — सब कुछ ईश्वर का है, सब कुछ में ईश्वर है।

श्री रुद्रम् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (4.5 और 4.7) में मिलता है। इसके दो भाग हैं — नमकम् ('नमः' बार-बार आता है) और चमकम् ('च मे' बार-बार आता है)। यह पहला मंत्र नमकम् का आरंभ है।

परंपरा में श्री रुद्रम् को शिव-उपासना का सर्वोच्च वैदिक पाठ माना जाता रहा है। अभिषेकम् के समय इसका पाठ विशेष रूप से प्रचलित है।

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