📿 श्लोक संग्रह

गायत्री मंत्र

ऋग्वेद 3.62.10 वैदिक मंत्र
📖 ऋग्वेद, मण्डल 3, सूक्त 62, मंत्र 10
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यम्
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
परमात्मा का नाम, प्रणव
भूः
भूलोक (पृथ्वी)
भुवः
अंतरिक्ष लोक
स्वः
स्वर्गलोक
तत्
उस
सवितुः
सविता (सूर्य, प्रेरक देवता) का
वरेण्यम्
सबसे श्रेष्ठ, वरण करने योग्य
भर्गः
तेज, प्रकाश
देवस्य
देव का
धीमहि
हम ध्यान करें
धियः
बुद्धि को
यः
जो
नः
हमारी
प्रचोदयात्
प्रेरित करे, सन्मार्ग दिखाए

गायत्री मंत्र वेदों का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है। इसमें सविता देवता (सूर्य के प्रेरक रूप) से प्रार्थना की गई है कि वे हमारी बुद्धि को सही रास्ते पर ले जाएँ। जैसे सूरज उगता है तो अँधेरा अपने आप दूर हो जाता है — वैसे ही सविता देवता का प्रकाश मन के अँधेरे को दूर करता है।

इस मंत्र की शुरुआत 'ॐ भूर्भुवः स्वः' से होती है — ये तीनों लोकों (पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग) के नाम हैं। इसके बाद सविता देवता के सर्वश्रेष्ठ तेज का ध्यान किया गया है। और अंत में प्रार्थना है — हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करो।

यह मंत्र एक सुंदर प्रार्थना है। इसमें कोई माँग नहीं है — न धन की, न सुख की, न शक्ति की। बस एक ही विनती है — हमारी बुद्धि ठीक रहे, हम सही-ग़लत की पहचान कर सकें। परंपरा में इसे सबसे ऊँची प्रार्थना माना जाता रहा है।

गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में ऋषि विश्वामित्र द्वारा दृष्ट माना जाता है। यह गायत्री छंद में है, जिसमें तीन पंक्तियाँ और प्रत्येक में आठ अक्षर होते हैं। इसी छंद के नाम पर इस मंत्र को गायत्री मंत्र कहा जाता है।

परंपरा में गायत्री मंत्र को 'वेदमाता' कहा जाता रहा है — अर्थात सभी वेदों का सार। सन्ध्या वंदन में इस मंत्र का प्रमुख स्थान रहा है।

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