यह महामृत्युंजय मंत्र है — मृत्यु पर विजय पाने का मंत्र। इसमें त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले शिव) की स्तुति की गई है। उन्हें 'सुगन्धि' कहा गया है — जैसे फूल की सुगंध चारों ओर फैलती है, वैसे ही भगवान का आनंद सबमें व्याप्त है। और 'पुष्टिवर्धन' — अर्थात वे सबका पोषण करते हैं।
इस मंत्र में एक बड़ी सुंदर उपमा है। जैसे पकी हुई ककड़ी (उर्वारुक) अपनी बेल से सहज ही अलग हो जाती है — बिना किसी कष्ट के, बिना खींचे — वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से सहज मुक्ति मिले। यह प्रार्थना भय से नहीं, बल्कि सहजता से मुक्ति की कामना करती है।
अंत की पंक्ति 'मा अमृतात्' का अर्थ है — हमें अमृत (मोक्ष) से वंचित न किया जाए। यह मंत्र मृत्यु से भागने की नहीं, बल्कि मृत्यु से ऊपर उठने की प्रार्थना है।