📿 श्लोक संग्रह

ॐ सह नाववतु

तैत्तिरीय उपनिषद्, शांति मंत्र वैदिक मंत्र
📖 तैत्तिरीय उपनिषद्, कृष्ण यजुर्वेद
ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु ।
मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सह
साथ-साथ, मिलकर
नौ
हम दोनों को
अवतु
रक्षा करे
भुनक्तु
पोषण करे
वीर्यम्
सामर्थ्य, बल
करवावहै
हम दोनों करें
तेजस्वि
तेजस्वी, प्रभावशाली
अधीतम्
पढ़ा हुआ (अध्ययन)
अस्तु
हो
मा
नहीं
विद्विषावहै
हम द्वेष करें
शान्तिः
शांति

यह शांति मंत्र गुरु और शिष्य मिलकर बोलते हैं। इसमें दोनों की प्रार्थना है — हम दोनों की साथ-साथ रक्षा हो, हम दोनों का साथ-साथ पोषण हो, हम दोनों मिलकर बल प्राप्त करें। कितनी सुंदर बात है — गुरु भी शिष्य के साथ सीख रहा है, शिष्य भी गुरु के साथ।

फिर कहा गया है — हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, अर्थात जो पढ़ें वह प्रभावशाली हो, काम आए। और सबसे ज़रूरी बात — हम दोनों में कभी द्वेष (ईर्ष्या या झगड़ा) न हो। गुरु-शिष्य का रिश्ता स्नेह और सम्मान पर टिका है, उसमें कोई कड़वाहट नहीं आनी चाहिए।

अंत में तीन बार 'शान्तिः' कहा गया है। परंपरा में कहा जाता रहा है कि ये तीन शांति तीन प्रकार के कष्टों — आधिदैविक (प्राकृतिक), आधिभौतिक (बाहरी), और आध्यात्मिक (भीतरी) — की शांति के लिए हैं।

यह शांति मंत्र तैत्तिरीय उपनिषद् से है जो कृष्ण यजुर्वेद का भाग है। तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा, आनंद और ज्ञान के बारे में बहुत सुंदर उपदेश हैं। यह शांति मंत्र अध्ययन के आरंभ में बोला जाता है।

परंपरा में किसी भी शास्त्रीय अध्ययन या पाठ से पहले शांति मंत्र बोलने की प्रथा रही है। यह मंत्र विशेष रूप से गुरुकुल परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है।

वैदिक मंत्र · 3 / 8
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