यह शांति मंत्र गुरु और शिष्य मिलकर बोलते हैं। इसमें दोनों की प्रार्थना है — हम दोनों की साथ-साथ रक्षा हो, हम दोनों का साथ-साथ पोषण हो, हम दोनों मिलकर बल प्राप्त करें। कितनी सुंदर बात है — गुरु भी शिष्य के साथ सीख रहा है, शिष्य भी गुरु के साथ।
फिर कहा गया है — हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, अर्थात जो पढ़ें वह प्रभावशाली हो, काम आए। और सबसे ज़रूरी बात — हम दोनों में कभी द्वेष (ईर्ष्या या झगड़ा) न हो। गुरु-शिष्य का रिश्ता स्नेह और सम्मान पर टिका है, उसमें कोई कड़वाहट नहीं आनी चाहिए।
अंत में तीन बार 'शान्तिः' कहा गया है। परंपरा में कहा जाता रहा है कि ये तीन शांति तीन प्रकार के कष्टों — आधिदैविक (प्राकृतिक), आधिभौतिक (बाहरी), और आध्यात्मिक (भीतरी) — की शांति के लिए हैं।