📿 श्लोक संग्रह

असतो मा सद्गमय

बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 वैदिक मंत्र
📖 बृहदारण्यक उपनिषद्, शुक्ल यजुर्वेद
ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
असतः
असत्य से, अनित्य से
मा
मुझे
सत्
सत्य की ओर, शाश्वत की ओर
गमय
ले चलो
तमसः
अंधकार से
ज्योतिः
प्रकाश की ओर
मृत्योः
मृत्यु से
अमृतम्
अमरत्व की ओर
शान्तिः
शांति

यह मंत्र तीन प्रार्थनाओं से बना है और तीनों एक ही बात कहती हैं — मुझे नीचे से ऊपर ले चलो। पहली प्रार्थना है — मुझे असत्य (झूठ, भ्रम) से सत्य की ओर ले चलो। जैसे कोई रास्ता भटका हुआ यात्री कहे — मुझे सही रास्ता दिखाओ।

दूसरी प्रार्थना है — अँधेरे से उजाले की ओर ले चलो। जब अज्ञान का अँधेरा होता है तो मनुष्य ठोकर खाता है, गिरता है। जब ज्ञान का उजाला आता है तो सब साफ़ दिखाई देता है। जैसे रात में कमरे में दीया जलाने से सब कुछ दिख जाता है — वैसे ही ज्ञान सब स्पष्ट कर देता है।

तीसरी प्रार्थना है — मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यहाँ मृत्यु का अर्थ केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि वह सब कुछ जो नश्वर है, जो बदलता है, जो टिकता नहीं। और अमृत का अर्थ है वह शाश्वत सत्य जो कभी नहीं बदलता।

यह मंत्र बृहदारण्यक उपनिषद् से है जो शुक्ल यजुर्वेद का भाग है। बृहदारण्यक सबसे बड़ी और सबसे प्राचीन उपनिषदों में से एक मानी जाती है। यह मंत्र प्राणविद्या (प्राण के ज्ञान) के प्रसंग में आता है।

परंपरा में यह मंत्र बहुत प्रसिद्ध रहा है और इसे उपनिषदों की भावना का सार माना जाता रहा है — अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर यात्रा।

वैदिक मंत्र · 4 / 8
वैदिक मंत्र · 4 / 8 अगला →