यह मंत्र तीन प्रार्थनाओं से बना है और तीनों एक ही बात कहती हैं — मुझे नीचे से ऊपर ले चलो। पहली प्रार्थना है — मुझे असत्य (झूठ, भ्रम) से सत्य की ओर ले चलो। जैसे कोई रास्ता भटका हुआ यात्री कहे — मुझे सही रास्ता दिखाओ।
दूसरी प्रार्थना है — अँधेरे से उजाले की ओर ले चलो। जब अज्ञान का अँधेरा होता है तो मनुष्य ठोकर खाता है, गिरता है। जब ज्ञान का उजाला आता है तो सब साफ़ दिखाई देता है। जैसे रात में कमरे में दीया जलाने से सब कुछ दिख जाता है — वैसे ही ज्ञान सब स्पष्ट कर देता है।
तीसरी प्रार्थना है — मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यहाँ मृत्यु का अर्थ केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि वह सब कुछ जो नश्वर है, जो बदलता है, जो टिकता नहीं। और अमृत का अर्थ है वह शाश्वत सत्य जो कभी नहीं बदलता।