पुरुषसूक्त वेदों के सबसे प्रसिद्ध सूक्तों में से एक है। इसका पहला मंत्र बताता है कि वह विराट पुरुष (परमात्मा) हज़ारों सिर वाला है, हज़ारों आँखों वाला है, हज़ारों पैरों वाला है। यहाँ 'सहस्र' का अर्थ अनगिनत है — इतना विशाल कि गिना ही नहीं जा सकता।
फिर कहा गया है कि वह पूरी पृथ्वी को चारों ओर से ढककर भी दस अंगुल और आगे फैला हुआ है। यह 'दशाङ्गुलम्' एक प्रतीक है — इसका अर्थ है कि परमात्मा इस सारी सृष्टि से भी बड़ा है, सबमें होते हुए भी सबसे परे है।
जैसे आकाश सब जगह है — हर कमरे में, हर पहाड़ पर, हर समुद्र के ऊपर — और फिर भी आकाश की कोई सीमा नहीं, वैसे ही वह विराट पुरुष सब जगह है और फिर भी असीम है।