📿 श्लोक संग्रह

सहस्रशीर्षा पुरुषः

ऋग्वेद 10.90.1 वैदिक मंत्र
📖 ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 90 (पुरुषसूक्त)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥
सहस्रशीर्षा
हज़ारों सिर वाला
पुरुषः
विराट पुरुष (परमात्मा)
सहस्राक्षः
हज़ारों नेत्रों वाला
सहस्रपात्
हज़ारों चरणों वाला
सः
वह
भूमिम्
पृथ्वी को
विश्वतः
सब ओर से
वृत्वा
ढककर, व्याप्त करके
अत्यतिष्ठत्
और भी आगे फैला हुआ है
दशाङ्गुलम्
दस अंगुल (अर्थात इस सबसे भी परे)

पुरुषसूक्त वेदों के सबसे प्रसिद्ध सूक्तों में से एक है। इसका पहला मंत्र बताता है कि वह विराट पुरुष (परमात्मा) हज़ारों सिर वाला है, हज़ारों आँखों वाला है, हज़ारों पैरों वाला है। यहाँ 'सहस्र' का अर्थ अनगिनत है — इतना विशाल कि गिना ही नहीं जा सकता।

फिर कहा गया है कि वह पूरी पृथ्वी को चारों ओर से ढककर भी दस अंगुल और आगे फैला हुआ है। यह 'दशाङ्गुलम्' एक प्रतीक है — इसका अर्थ है कि परमात्मा इस सारी सृष्टि से भी बड़ा है, सबमें होते हुए भी सबसे परे है।

जैसे आकाश सब जगह है — हर कमरे में, हर पहाड़ पर, हर समुद्र के ऊपर — और फिर भी आकाश की कोई सीमा नहीं, वैसे ही वह विराट पुरुष सब जगह है और फिर भी असीम है।

पुरुषसूक्त ऋग्वेद के दसवें मण्डल में आता है और इसमें 16 मंत्र हैं। इसे यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी पाया जाता है। परंपरा में पुरुषसूक्त का पाठ यज्ञों और पूजाओं में बहुत प्रचलित रहा है।

इस सूक्त में बताया गया है कि सृष्टि विराट पुरुष के यज्ञ से उत्पन्न हुई — चन्द्रमा उनके मन से, सूर्य उनकी आँखों से, वायु उनके प्राण से।

वैदिक मंत्र · 5 / 8
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